कस्तूरी कुन्डल बसे, म्रग ढ़ूंढ़े बन माहिं ।
ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नाहिं ॥
करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय ।
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय ॥
जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥
नये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय ।
मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय ॥
मांगण मरण समान है, बिरता बंचै कोई ।
कहै कबीर रघुनाथ सूं, मति रे मंगावे मोहि ॥
मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाँव ।
मूल नाम गुरु वचन है, मूल सत्य सतभाव ॥
जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिसका जाय ।
सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय ॥
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बुधवार, 4 अगस्त 2010
शनिवार, 24 जुलाई 2010
काल करे सो आज कर
पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥
कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥
आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥
कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥
आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग
कबीर सुता क्या करे, करे काज निवार|
जिस पंथ तू चलना, तो पंथ संवार||
जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग|
तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग||
जीवत समझे जीवत बुझे, जीवत ही करो आस|
जीवत करम की फाँस न काटी, मुए मुक्ति की आस||
अकथ कहानी प्रेम की, कुछ कही न जाये|
गूंगे केरी सर्करा, बैठे मुस्काए||
मुंड मुंडावत दिन गए, अजहूँ न मिलिया राम|
राम नाम कहू क्या करे, जे मन के औरे काम||
पहले अगन बिरहा की, पाछे प्रेम की प्यास|
कहे कबीर तब जानिए, नाम मिलन की आस|
एक कहूँ तो है नहीं, दो कहूँ तो गारी|
है जैसा तैसा रहे, कहे कबीर बिचारी|
जिस पंथ तू चलना, तो पंथ संवार||
जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग|
तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग||
जीवत समझे जीवत बुझे, जीवत ही करो आस|
जीवत करम की फाँस न काटी, मुए मुक्ति की आस||
अकथ कहानी प्रेम की, कुछ कही न जाये|
गूंगे केरी सर्करा, बैठे मुस्काए||
मुंड मुंडावत दिन गए, अजहूँ न मिलिया राम|
राम नाम कहू क्या करे, जे मन के औरे काम||
पहले अगन बिरहा की, पाछे प्रेम की प्यास|
कहे कबीर तब जानिए, नाम मिलन की आस|
एक कहूँ तो है नहीं, दो कहूँ तो गारी|
है जैसा तैसा रहे, कहे कबीर बिचारी|
मंगलवार, 13 अप्रैल 2010
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में
जो सुख पाऊँ राम भजन में ,
सो सुख नाहिं अमीरी में,
सो सुख नाहिं अमीरी में,
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
भला बुरा सब का सुनलीजै,
कर गुजरान गरीबी में,
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
आखिर यह तन छार मिलेगा,
कहाँ फिरत मग़रूरी में,
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
प्रेम नगर में रहनी हमारी,
साहिब मिले सबूरी में,
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
कहत कबीर सुनो भयी साधो,
साहिब मिले सबूरी में,
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय ।
शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥
दुख में सुमरिन सब करे, सुख मे करे न कोय ।
जो सुख मे सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥
गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥
कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥
जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय ।
प्रेम गली अति साँकरी, ता मे दो न समाय ॥
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥
दुख में सुमरिन सब करे, सुख मे करे न कोय ।
जो सुख मे सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥
गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥
कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥
जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय ।
प्रेम गली अति साँकरी, ता मे दो न समाय ॥
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥
गुरुवार, 8 अप्रैल 2010
मोको कहां ढूँढे रे बन्दे
मोको कहां ढूँढे रे बन्दे,
मैं तो तेरे पास में|
ना तीरथ मे ना मूरत में,
ना एकान्त निवास में,
ना मंदिर में ना मस्जिद में,
ना काबे कैलास में,
मैं तो तेरे पास में बन्दे!
मैं तो तेरे पास में!
ना मैं जप में ना मैं तप में,
ना मैं बरत उपास में,
ना मैं किरिया करम में रहता,
नहिं जोग सन्यास में,
नहिं प्राण में नहिं पिंड में,
ना ब्रह्याण्ड आकाश में,
ना मैं प्रकुति प्रवार गुफा में,
नहिं स्वांसों की स्वांस में,
खोजि होए तुरत मिल जाउं,
इक पल की तालास में!
कहत कबीर सुनो भई साधो,
मैं तो हूं विश्वास में !!!
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
सॉंच बराबर तप नहीं...
जाति न पूछो साधु की,
पूछ लीजिए ग्यान।
मोल करो तलवार के,
पड़ा रहन दो म्यान।।
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जिन ढूँढा तिन पाइयॉं,
गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा,
रहा किनारे बैठ।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
सॉंच बराबर तप नहीं,
झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै सॉंच है,
ताके हिरदै आप।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
बोली एक अनमोल है,
जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौलि के,
तब मुख बाहर आनि।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
अति का भला न बोलना,
अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना,
अति की भली न धूप।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
पाहन पुजे तो हरि मिले,
तो मैं पूजूँ पहाड़।
ताते या चाकी भली,
पीस खाए संसार।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
निंदक नियरे राखिए,
ऑंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना,
निर्मल करे सुभाय।।
पूछ लीजिए ग्यान।
मोल करो तलवार के,
पड़ा रहन दो म्यान।।
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जिन ढूँढा तिन पाइयॉं,
गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा,
रहा किनारे बैठ।।
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सॉंच बराबर तप नहीं,
झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै सॉंच है,
ताके हिरदै आप।।
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बोली एक अनमोल है,
जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौलि के,
तब मुख बाहर आनि।।
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अति का भला न बोलना,
अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना,
अति की भली न धूप।।
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पाहन पुजे तो हरि मिले,
तो मैं पूजूँ पहाड़।
ताते या चाकी भली,
पीस खाए संसार।।
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निंदक नियरे राखिए,
ऑंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना,
निर्मल करे सुभाय।।
सोमवार, 28 सितंबर 2009
कबीरा खडा बाज़ार,
मांगे सब की खैर!
ना काहु से दोस्ती,
ना काहु से बैर!!
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चलती चक्की देखि के,
दिया कबीरा रोय!
दुई पाटन के बिच में,
साबुत बचिया न कोई!!
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बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलया कोय,
जो मन खोजा आपना,
तो मुझसे बुरा न कोई!!
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कंकर-पत्थर जोरी के,
मस्जिद लई बनाय!
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे,
क्या बहरा हुआ खुदाय!!
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पोती पढ़ी-पढ़ी जग मुआँ,
पंडित भया न कोई!
ढाई आखर प्रेम का,
पढ़े सो पंडित होई!!
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कबीर यह घर प्रेम का,
खाला का घर नाहिं!
सीस उतारै हाथि धरी,
सो पैसे घर माहिं!!
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धीरे धीरे रे मना,
धीरे सब कुछ होय!
माली सींचे सौ घडा,
ऋतू आये फल होय!!
मांगे सब की खैर!
ना काहु से दोस्ती,
ना काहु से बैर!!
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चलती चक्की देखि के,
दिया कबीरा रोय!
दुई पाटन के बिच में,
साबुत बचिया न कोई!!
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बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलया कोय,
जो मन खोजा आपना,
तो मुझसे बुरा न कोई!!
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कंकर-पत्थर जोरी के,
मस्जिद लई बनाय!
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे,
क्या बहरा हुआ खुदाय!!
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पोती पढ़ी-पढ़ी जग मुआँ,
पंडित भया न कोई!
ढाई आखर प्रेम का,
पढ़े सो पंडित होई!!
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कबीर यह घर प्रेम का,
खाला का घर नाहिं!
सीस उतारै हाथि धरी,
सो पैसे घर माहिं!!
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धीरे धीरे रे मना,
धीरे सब कुछ होय!
माली सींचे सौ घडा,
ऋतू आये फल होय!!
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